भारत के खाने की कहानी केवल इस बात की कहानी नहीं है कि किस जगह कौन-सा व्यंजन प्रसिद्ध है। अगर हम थोड़ा पीछे जाकर देखें, तो हमारी आज की थाली में दिखाई देने वाली लगभग हर महत्वपूर्ण चीज के पीछे कोई न कोई ऐतिहासिक यात्रा छिपी हुई है। चावल और गेहूँ जैसे अनाज हमें प्राचीन कृषि की ओर ले जाते हैं, मसाले पुराने व्यापारिक रास्तों की याद दिलाते हैं और मिर्च, टमाटर तथा आलू जैसी चीजें हमें उस समय तक ले जाती हैं जब समुद्री व्यापार ने भारत को दुनिया के दूसरे हिस्सों से जोड़ा। इसी तरह बिरयानी और दूसरी कई dishes हमें अलग-अलग संस्कृतियों के बीच हुए लंबे संपर्क की याद दिलाती हैं। इसलिए भारतीय food culture को केवल recipes के जरिए समझना मुश्किल है। इसे समझने के लिए हमें उन ऐतिहासिक घटनाओं को भी देखना होगा जिन्होंने यह तय किया कि भारत में क्या उगेगा, क्या बाजार तक पहुँचेगा और आखिर में क्या हमारी रसोई का हिस्सा बनेगा।
1. भारतीय खाद्य संस्कृति की शुरुआत खेती से हुई
भारत की खाद्य संस्कृति की सबसे पुरानी कहानी किसी राजदरबार से नहीं, बल्कि खेती से शुरू होती है। यह बात शायद बहुत साधारण लगे, लेकिन असल में भोजन के इतिहास को समझने की यही सबसे जरूरी कड़ी है। किसी भी समाज के पास भोजन के वही विकल्प होते हैं जो उसके आसपास की जमीन, पानी, मौसम और प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध कराते हैं। उत्तर प्रदेश की बेलन घाटी में स्थित कोल्डिहवा और महागरा जैसे पुरातात्विक स्थलों से carbonized rice husks और rice grains मिलने की जानकारी सामने आई है, जिन्हें लगभग 7वीं–6वीं सहस्राब्दी BCE तक का माना गया है। इन अवशेषों का महत्व सिर्फ इस बात में नहीं है कि उस समय चावल मौजूद था, बल्कि यह भी है कि अलग-अलग क्षेत्रों में रहने वाले समुदाय अपने स्थानीय पर्यावरण के हिसाब से भोजन और खेती की अलग-अलग परंपराएँ विकसित कर रहे थे। जहाँ पानी और जमीन चावल के लिए अनुकूल थी, वहाँ उसका महत्व बढ़ा, जबकि दूसरे इलाकों में गेहूँ, जौ, बाजरा और दूसरी फसलों ने ज्यादा जगह बनाई। यही वजह है कि भारत में शुरुआत से ही एक जैसी food culture नहीं बनी। अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों ने अलग-अलग regional food traditions को जन्म दिया और आगे चलकर यही विविधता भारतीय cuisine की पहचान बन गई।
2. सिंधु सभ्यता ने भोजन को शहरों की व्यवस्था से जोड़ दिया
जब खेती का विस्तार हुआ और बड़े settlements तथा शहर विकसित होने लगे, तो भोजन की जरूरत भी बदलने लगी। अब खेती केवल किसी परिवार या छोटे समुदाय का पेट भरने का साधन नहीं थी, बल्कि बड़े urban centres को लगातार food supply देने की जरूरत थी। सिंधु या हड़प्पा सभ्यता इसी बदलाव को समझने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। राखीगढ़ी के आसपास के स्थलों से मिले botanical remains पर हुए शोध में rice, millets और tropical pulses जैसी अलग-अलग फसलों के प्रमाण मिले हैं। शोध से यह भी संकेत मिलता है कि अलग-अलग crops और multi-cropping strategies का इस्तेमाल किया जाता था, जिससे अलग मौसमों में food production को बनाए रखने में मदद मिलती थी। Binjor जैसे Harappan स्थल से भी लगभग 2900–2600 BCE के agricultural occupation के प्रमाण मिले हैं और बाद के चरणों में climate तथा water availability में बदलाव के साथ cropping strategies में भी परिवर्तन दिखाई देता है। इसका मतलब यह है कि उस समय भी भोजन केवल लोगों की पसंद से तय नहीं हो रहा था। जलवायु, पानी और खेती की परिस्थितियाँ यह तय करने में बड़ी भूमिका निभा रही थीं कि किसी क्षेत्र में क्या उगेगा और वहाँ के लोगों के भोजन में क्या अधिक दिखाई देगा। इस तरह जैसे-जैसे शहरों का विकास हुआ, वैसे-वैसे agriculture और food supply एक-दूसरे से और मजबूती से जुड़ते चले गए।
3. अलग-अलग क्षेत्रों के बीच फसलों और खाद्य परंपराओं का आदान-प्रदान हुआ
खेती के अलग-अलग रूप विकसित होने के बाद भारतीय खाद्य संस्कृति में अगला बड़ा बदलाव तब आया जब फसलें और उनसे जुड़ी जानकारी एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुँचने लगी। Archaeological research में seeds, pottery और दूसरे food-related evidence के आधार पर यह समझने की कोशिश की गई है कि अलग-अलग crops भारतीय उपमहाद्वीप में कैसे फैलीं। कुछ शोधों में horsegram और mungbean जैसी फसलों के दक्षिण से उत्तर की ओर फैलने की बात सामने आती है, जबकि African millets जैसी फसलें भी समय के साथ भारतीय agricultural systems का हिस्सा बनीं। किसी फसल का एक जगह से दूसरी जगह पहुँचना सिर्फ खेती का बदलाव नहीं होता, क्योंकि उसके साथ उसे उगाने, सुरक्षित रखने और पकाने का ज्ञान भी आगे बढ़ सकता है। इसलिए भारत की food culture को शुरू से ही पूरी तरह अलग-अलग और बंद regional traditions के रूप में देखना सही नहीं होगा। इनके बीच लगातार संपर्क और आदान-प्रदान होता रहा। आज जिसे हम किसी क्षेत्र का “traditional food” कहते हैं, उसके पीछे भी कई बार ऐसी पुरानी यात्राएँ छिपी होती हैं जिनमें फसलें, लोग और उनके खाने के तरीके एक जगह से दूसरी जगह पहुँचे।
4. राज्य और कृषि व्यवस्था मजबूत हुई तो भोजन का आर्थिक महत्व बढ़ा
समय के साथ जब बड़े राज्य और प्रशासनिक व्यवस्थाएँ विकसित हुईं, तो खेती का महत्व केवल किसान और परिवार तक सीमित नहीं रहा। कृषि राज्य की आय और आर्थिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बनने लगी। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में farming और herding को state revenue के संदर्भ में देखा गया है, जबकि बाद की सदियों के inscriptions में land grants और agricultural arrangements का भी उल्लेख मिलता है। इसका भोजन से संबंध पहली नजर में थोड़ा अप्रत्यक्ष लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह काफी सीधा था। जिस फसल का उत्पादन आर्थिक और राजस्व व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण होता था, उसके cultivation और irrigation की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण बनती थी। इस तरह जमीन, पानी और कृषि उत्पादन केवल किसानों की निजी जरूरत नहीं रहे, बल्कि राज्य और समाज की बड़ी व्यवस्था का हिस्सा बन गए। यही बदलाव आगे चलकर भारत की food history को और जटिल बनाता है, क्योंकि अब भोजन केवल यह नहीं था कि लोग क्या उगाते और खाते हैं, बल्कि यह भी था कि कौन-सी फसल कितनी महत्वपूर्ण है, उसका उत्पादन कहाँ होता है और उससे किस तरह की आर्थिक व्यवस्था जुड़ी हुई है।
5. मध्यकाल में व्यापार और साम्राज्यों ने भारतीय भोजन को नया रूप दिया
मध्यकालीन भारत में food culture में आए बदलाव को केवल नए शासकों के आने से समझना सही नहीं होगा। इस समय कृषि का विस्तार, irrigation, व्यापार और अलग-अलग सांस्कृतिक समूहों के बीच संपर्क भी लगातार बढ़ रहा था। दिल्ली सल्तनत और बाद में Mughal period में कई क्षेत्रों में agricultural production और irrigation systems का विस्तार हुआ, जिससे अलग-अलग प्रकार की crops का उत्पादन संभव हुआ। इसी वातावरण में Persianate और Central Asian culinary traditions का संपर्क पहले से मौजूद भारतीय cooking traditions से हुआ। 16वीं से 18वीं शताब्दी के बीच South Asia में Persian-language culinary manuals भी लिखे गए, जिनमें recipes और culinary practices का विवरण मिलता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बाहर से कोई एक पूरी cuisine भारत में आई और उसने स्थानीय भोजन को बदल दिया। वास्तविक प्रक्रिया कहीं अधिक धीमी और दिलचस्प थी। स्थानीय ingredients और cooking methods पहले से मौजूद थे और उनके संपर्क में नई culinary techniques तथा स्वाद आए। समय के साथ दोनों का मेल हुआ और अलग-अलग क्षेत्रों में उनके नए भारतीय रूप विकसित हुए। इसी लंबे interaction को समझने से बिरयानी, पुलाव, कोरमा और कबाब जैसी traditions के विकास को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।
6. नई फसलों ने भारतीय कृषि और भोजन की तस्वीर बदलनी शुरू की
मध्यकालीन संपर्कों का प्रभाव केवल राजदरबारों और cooking techniques तक सीमित नहीं था। नई फसलें भी भारतीय agricultural landscape का हिस्सा बनने लगीं। Agrarian history के अनुसार 17वीं शताब्दी में tobacco और maize जैसी फसलों का भारत में introduction और expansion हुआ। किसी नई फसल का भारत पहुँचना अपने आप में food culture का हिस्सा नहीं बन जाता। उसे पहले स्थानीय जमीन और मौसम के अनुकूल होना पड़ता है, फिर उसका उत्पादन बढ़ता है, उसके लिए बाजार बनता है और धीरे-धीरे लोग उसे अपने भोजन में शामिल करना शुरू करते हैं। इसीलिए किसी फसल को आज भारतीय कृषि का सामान्य हिस्सा देखकर यह भूल जाना आसान है कि उसकी भी कभी एक नई और अनजानी फसल के रूप में भारत में शुरुआत हुई थी। इसी तरह भारत का food system धीरे-धीरे उन चीजों को भी अपनाता गया जो कभी बाहर से आई थीं।
7. समुद्री व्यापार ने भारतीय रसोई को दुनिया से जोड़ दिया
15वीं और 16वीं शताब्दी के बाद European maritime trade ने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के बीच crops और commodities के आदान-प्रदान को बहुत तेज कर दिया। Portuguese traders के माध्यम से Americas से आने वाली कई फसलें Old World तक पहुँचीं और इसी global exchange के बाद chilli, tomato और potato जैसी चीजें भारत में भी पहुँचीं। मिर्च इसका सबसे दिलचस्प उदाहरण है। आज भारतीय भोजन की कल्पना मिर्च के बिना करना मुश्किल लगता है, लेकिन भारत में इसकी अपनी यात्रा बाहर से आने के बाद शुरू हुई थी। धीरे-धीरे अलग-अलग regional cuisines ने इसे अपने तरीके से अपनाया और वह चटनी, अचार, मसालों और रोजमर्रा की cooking का हिस्सा बन गई। यही प्रक्रिया बताती है कि भारतीय food culture केवल बाहर से चीजें लेने वाली संस्कृति नहीं रही। भारत ने नई चीजों को अपने स्वाद और स्थानीय cooking traditions के अनुसार बदलकर उन्हें अपना रूप दिया। इसीलिए किसी ingredient का विदेशी मूल होना और उसका भारतीय food culture का हिस्सा बन जाना दो अलग-अलग ऐतिहासिक प्रक्रियाएँ हैं।
8. औपनिवेशिक शासन में भोजन पहचान और राजनीति से जुड़ने लगा
British colonial period भारतीय food history में एक महत्वपूर्ण turning point था, क्योंकि इस दौर में भोजन केवल स्वाद और पोषण का विषय नहीं रहा। Food धीरे-धीरे caste, religion, class, gender और cultural identity जैसे सवालों से जुड़ने लगा। Colonial writings में Indian food और kitchens को कई बार आलोचना के नजरिए से देखा गया और इसके जवाब में भारतीय समाज के कुछ हिस्सों ने अपनी food traditions को cultural identity के रूप में प्रस्तुत करना शुरू किया। Bengal पर हुए historical research से पता चलता है कि 19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में food और cuisine colonialism तथा nationalism के बीच चल रहे cultural debate का हिस्सा बनने लगे थे। इसका मतलब यह नहीं कि उस समय लोगों ने अचानक खाना अलग तरह से खाना शुरू कर दिया था। बदलाव इससे ज्यादा गहरा था। पुराने भोजन और खाने की आदतों को नए अर्थ मिलने लगे और रसोई धीरे-धीरे identity को व्यक्त करने की जगह भी बन गई।
9. उत्तर भारत में vegetarianism और शुद्ध भोजन को नया सामाजिक अर्थ मिला
औपनिवेशिक दौर में उत्तर भारत में food और identity का संबंध और स्पष्ट दिखाई देता है। University of Delhi की historian Charu Gupta के शोध के अनुसार 20वीं शताब्दी की शुरुआत में प्रकाशित Hindi cookbooks ने food को religion, caste, gender, health और nationalism से जोड़ने में भूमिका निभाई। इनमें से कई cookbooks ने vegetarian food को ideal Hindu diet के रूप में प्रस्तुत किया और एक कथित “golden culinary past” की कल्पना की। यहाँ इतिहास को समझते समय एक जरूरी अंतर रखना होगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्राचीन भारत के सभी लोग vegetarian थे। Evidence यह दिखाता है कि colonial period में कुछ सामाजिक और राजनीतिक समूहों ने vegetarianism को एक विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक identity के रूप में अधिक जोर देकर प्रस्तुत किया। यानी food practice जरूरी नहीं कि नई हो, लेकिन समय बदलने के साथ उसका सामाजिक और राजनीतिक अर्थ बदल सकता है। यही बदलाव आगे भोजन को nationalism से जोड़ने वाली सोच के लिए भी जमीन तैयार करता है।
10. स्वतंत्रता आंदोलन में भोजन राजनीतिक अभिव्यक्ति का माध्यम बना
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान food ने एक और नया अर्थ हासिल किया। महात्मा गांधी ने fasting और vegetarianism को अपने विचारों में महत्वपूर्ण स्थान दिया और भोजन को self-control, शरीर और non-violence जैसे विचारों से जोड़ा। इस संदर्भ में भोजन केवल रोजमर्रा की जरूरत नहीं रहा, बल्कि विचार और राजनीतिक पहचान व्यक्त करने का माध्यम भी बन गया। यह बदलाव भारतीय food history में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि खाने की आदतें हमेशा केवल स्वाद या भूख से तय नहीं होतीं। कभी-कभी समाज किसी भोजन को अपनी धार्मिक, सामाजिक या राजनीतिक सोच से जोड़ देता है और फिर वही भोजन एक बड़े cultural meaning का हिस्सा बन जाता है।
11. रेलवे ने भारत के अलग-अलग खाने को एक-दूसरे के करीब ला दिया
British India में रेलवे ने केवल यात्रियों और सामान की movement को आसान नहीं बनाया। उसने markets, cities और लोगों के बीच संपर्क भी बढ़ाया और इसका असर food culture पर पड़ना स्वाभाविक था। Railway stations पर refreshment rooms और food vendors दिखाई देने लगे और लंबी यात्राओं के कारण लोगों को घर के बाहर खाना पड़ने लगा। यह बदलाव बिल्कुल आसान नहीं था, क्योंकि caste और food purity से जुड़ी धारणाएँ अभी भी मजबूत थीं। Historical research में colonial North India के संदर्भ में railway food, caste-based food preferences और purity concerns के बीच इस संबंध का उल्लेख मिलता है। फिर भी लगातार बढ़ती mobility ने लोगों को अलग-अलग तरह के food environments के संपर्क में ला दिया। धीरे-धीरे public eating का दायरा बढ़ा और भोजन भी लोगों की तरह एक जगह से दूसरी जगह जाने लगा।
12. शहरों और Migration ने Regional Cuisines को पूरे भारत में फैलाया
रेलवे ने यात्रा को आसान बनाया और शहरों के विस्तार तथा migration ने इस movement को food culture में स्थायी रूप देना शुरू किया। जब कोई व्यक्ति रोजगार या व्यापार के लिए अपने hometown से दूसरे शहर में जाता था, तो वह केवल अपने साथ कपड़े और सामान नहीं ले जाता था। अक्सर अपने खाने की आदतें और स्वाद की पसंद भी साथ लेकर जाता था। इसी जरूरत ने restaurants, hotels, canteens और छोटे food businesses के विकास को बढ़ावा दिया। Punjabi food दिल्ली और दूसरे शहरों में लोकप्रिय हुआ, South Indian restaurants उत्तर भारत के शहरों में पहुँचे और Bengali, Gujarati, Rajasthani जैसी regional cuisines भी अपने मूल क्षेत्रों से बाहर दिखाई देने लगीं। इस तरह modern Indian food culture केवल अलग-अलग regional cuisines के मौजूद रहने की कहानी नहीं है। यह उन cuisines के एक जगह से दूसरी जगह जाकर नए लोगों के बीच अपनी जगह बनाने की कहानी भी है।
13. आजादी के बाद food security सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल हुई
1947 के बाद भारत के सामने कई बड़ी चुनौतियाँ थीं और उनमें से एक थी बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराना। 1950 और 1960 के दशक में food security national policy का महत्वपूर्ण विषय बन गई क्योंकि भारत food imports पर काफी निर्भर था। FAO के historical assessment के अनुसार 1956–60 के दौरान government-distributed food का लगभग 90% imports से आया था और 1961–65 में भी यह अनुपात लगभग 75% रहा। 1965–66 में अमेरिका से लगभग 10 million tonnes wheat shipments का भी उल्लेख मिलता है। इस परिस्थिति ने कृषि उत्पादन बढ़ाने की जरूरत को और गंभीर बना दिया। इसलिए अगले कुछ वर्षों में agricultural policy का ध्यान केवल यह सुनिश्चित करने पर नहीं रहा कि किसान खेती करते रहें, बल्कि इस बात पर भी गया कि देश बड़े पैमाने पर अनाज का उत्पादन कर सके।
14. Green Revolution ने भारतीय food system की दिशा बदल दी
1960s के बाद high-yielding varieties, irrigation, fertilizers और agricultural infrastructure के विस्तार ने खासकर wheat और rice production को तेजी से बढ़ाया। इसका असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहा, क्योंकि जब किसी crop का production बड़े पैमाने पर बढ़ता है तो उसकी availability, procurement और consumption पर भी असर पड़ता है। Cambridge की economic history के अनुसार independence के बाद agricultural infrastructure development और Green Revolution ने भारत के economic development में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके साथ wheat और rice भारतीय food system में और मजबूत हुए, जबकि कई क्षेत्रों में millets और कुछ traditional grains की relative importance कम हो गई। इसलिए आज millets को फिर से बढ़ावा देने की चर्चा केवल एक नए health trend की कहानी नहीं है। इसे भारतीय agricultural history के संदर्भ में देखें तो यह उन पुराने grains की ओर भी वापसी है जो कभी हमारी food traditions का सामान्य हिस्सा थे।
15. Liberalisation और globalization ने भारतीय रसोई को फिर बदल दिया
1990s के बाद economic liberalisation और globalization के साथ भारत के शहरों और markets में international foods, packaged products और global food brands की मौजूदगी बढ़ी। लेकिन भारतीय consumers ने इन foods को हमेशा उसी रूप में स्वीकार नहीं किया जिस रूप में वे बाहर से आए थे। Pizza में paneer और Indian toppings शामिल हुए, sandwiches में chutney और spices आए और Chinese food का अपना Indian version लोकप्रिय हुआ। Pasta और noodles भी अलग-अलग भारतीय ingredients और flavours के साथ नए रूप में दिखाई देने लगे। इस बदलाव में भी भारतीय food culture की वही पुरानी प्रवृत्ति दिखाई देती है जिसमें बाहर से आई चीज को स्थानीय स्वाद के अनुसार बदल लिया जाता है। फर्क सिर्फ इतना था कि पहले यह बदलाव समुद्री व्यापार के जरिए आए ingredients के साथ हुआ था और अब global markets तथा urban consumption के जरिए हो रहा था।
16. आज की भारतीय थाली में कई ऐतिहासिक दौर एक साथ दिखाई देते हैं
अगर आज किसी भारतीय kitchen को ध्यान से देखा जाए तो उसमें एक साथ कई अलग-अलग ऐतिहासिक समय दिखाई दे सकते हैं। चावल और गेहूँ प्राचीन agricultural traditions की याद दिलाते हैं, दालें और millets पुराने regional farming systems से जुड़ते हैं और मसाले भारत के लंबे व्यापारिक संपर्कों की कहानी बताते हैं। बिरयानी और कई Mughlai traditions medieval Persianate और Indian culinary interactions की याद दिलाती हैं, जबकि मिर्च, टमाटर और आलू global maritime exchange की कहानी बताते हैं। चाय और चीनी की आधुनिक consumption colonial commercial agriculture और बाद के market expansion से जुड़ी है और packaged foods तथा fast food industrialisation और globalization की कहानी कहते हैं। शायद सबसे दिलचस्प बात यह है कि इन सभी चीजों ने एक-दूसरे को हटाकर जगह नहीं बनाई। पुरानी चीजों के साथ नई चीजें जुड़ती गईं और कई बार जो चीजें पीछे चली गईं, वे भी नए समय में फिर लौट आईं। आज millets की बढ़ती चर्चा इसी बात का उदाहरण है कि food culture सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़ती, बल्कि समय के साथ चीजों को छोड़ती, अपनाती और फिर नए अर्थों के साथ वापस लाती रहती है।
निष्कर्ष: भारत की थाली वास्तव में उसके इतिहास का आईना है
भारत की खाद्य संस्कृति किसी एक समय, एक शासक या एक cuisine की देन नहीं है। यह हजारों वर्षों में हुए उन छोटे-बड़े बदलावों का परिणाम है जिनमें खेती, climate, व्यापार, migration, राजनीतिक सत्ता, धार्मिक विचार, colonial policies, urbanisation और globalization सभी की भूमिका रही। प्राचीन समय में environment और agriculture ने तय किया कि अलग-अलग क्षेत्रों में कौन-सी फसलें उगेंगी। बाद में crop exchange और व्यापार ने इन खाद्य परंपराओं को एक-दूसरे से जोड़ा। मध्यकालीन संपर्कों ने cooking traditions में नए तत्व जोड़े और समुद्री व्यापार ने मिर्च, टमाटर और आलू जैसी फसलों को भारतीय कृषि और भोजन का हिस्सा बना दिया। Colonial period में भोजन identity और nationalism से जुड़ा, जबकि रेलवे और migration ने regional cuisines को उनके मूल क्षेत्रों से बाहर पहुँचाया। आजादी के बाद food security और Green Revolution ने कृषि और cereal consumption की दिशा बदली और globalization ने भारतीय kitchen को दुनिया के बाकी हिस्सों के साथ और तेजी से जोड़ दिया।
इसलिए आज की भारतीय थाली को सिर्फ “traditional food” कह देना उसकी पूरी कहानी नहीं बताता। उस थाली में रखा हर अनाज, हर मसाला और हर dish किसी न किसी पुराने बदलाव की निशानी है। कोई चीज हमें प्राचीन खेती तक ले जाती है, कोई पुराने व्यापार मार्गों तक, कोई medieval cultural exchange तक और कोई modern globalisation तक। शायद इसी वजह से भारतीय भोजन इतना विविध दिखाई देता है। यह diversity किसी एक समय में पैदा नहीं हुई थी। यह पीढ़ियों तक चलते रहे बदलावों का परिणाम है। हमारी थाली इसलिए सिर्फ वह खाना नहीं है जो हम आज खाते हैं; वह उन हजारों वर्षों की कहानी भी है जिनसे गुजरकर यह खाना हमारे सामने पहुँचा है।
