भारत का असली खाना क्या है? 100, 500, 1000 साल पहले भारतीय क्या खाते थे? 

अभी कुछ दिन पहले की बात है Delhi में आयोजित ब्रिक्स summit में परोसे गए खाने को लेकर के देश के विपक्ष के द्वारा कई सवाल उठाये गए विपक्ष ने दावा किया की भारत के 85 % लोग माँसाहार का सेवन करते है और लम्बे समय से  भारत में मांसाहार लोगों के भोजन का एक प्रमुख हिस्सा रहा है फिर भी भारत में आये हुई मेहमानो को गणेश चतुर्थी की वजह से वेजिटेरिअन खाना ही परोसा गया ब्रिक्स के मेन्यू में खांडवी, पनीर लबाबदार, गुच्छी मरमिक, मिलेट पुलाव, खुंब गलौटी और जलेबी जैसे पारम्परिक शाकाहारी व्यंजन थे। इसी बात पर ये सवाल भी उठने लगा की क्या वास्तविकता में भारत के लोग कई वर्षों से केवल माँसाहार का सेवन करते आये है क्या आपके मन में कभी ये सवाल आया है की आज आप जिस खाने को खा रहे है क्या वो वास्तविकता में वही खाना है जिसे आपके पूर्वज खाया करते थे। क्या आपने कभी ये जानने की कोशिश की है की आखिरकार हमारे पूर्वज ऐसा क्या खाते थे जो आज दौर के लोगों से कई गुना अधिक स्वस्थ और तंदुरस्त रहते थे। आज के अपने इस लेख के माध्यम से हम इसी विषय पर एक विश्तार पूर्वक चर्चा करेंगे और आज के कई वर्षों पूर्व हमारे पूर्वर्जों की दैनिक थाली कैसी थी इसे जानने का प्रयाश करेंगे। तो चलिए अपना आज का यह लेख शुरू करते है।  

हरित क्रांति का भारतीय भोजन पर प्रभाव 

अगर आज किसी भी उत्तर भारतीय से पूछा जाये की उसका रोज का दैनिक आहार क्या है तो 100 में 99 % लोगों का जवाब होगा दाल, चावल,रोटी और सब्जी पर अगर आपसे कहा जाये की जिस चावल और दाल को आप रोज खाने में बड़े चाउ से खाते है ये आज से 40 – 50 वर्ष पूर्व भारतियों की रोज की थाली का हिस्सा नहीं था तो आप क्या कहेंगे। दरसल 1966-1967 के दौरान जब नॉर्मन बोरलॉग के प्रयासों से भारत में हरित क्रांति की शुरुआत हुई थी। उस वक्त भारत में खाद्यान एक बहुत बड़ी समस्या थी  भारत में क्रांति के जनक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन के प्रयासों के द्वारा भारत ने खाद्यान को लेकर के आत्मनिर्भरता तो पा ली लेकिन यदि वास्तविकता में देखा जाये तो हमारे समाज ने इसकी एक बहुत बड़ी कीमत भी चुकाई है क्यूंकि हरित क्रांति  के दौर से पहले तक बाजरा , रागी जौ , मक्का जो भारतीय थाली के मुख्य अनाज थे  इसने उसी लोगों की थाली से बिलकुल ही बाहर कर दिया है जिसका परिणाम ये है आईसीएमआर यानि Indian Council of Medical Research (भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद) के द्वारा जारी किये गए  लगभग 11% आबादी (यानी करीब 10.1 करोड़ से अधिक लोग) मधुमेह (शुगर/डाइबिटीज) से पीड़ित है। इसके अलावा, लगभग 15.3% लोग प्री-डायबिटीज (यानी भविष्य में शुगर होने का उच्च जोखिम) की स्थिति में हैं। यानि की हर १० में से एक यक्ति आज भारत में मधुमेह से पीड़ित है और हर 6 में से एक व्यक्ति को कही न कही डायबिटीज होने का खतरा है जबकि आज से 40 – 50 साल पहले ये सभी बीमारियां कही देखने सुनने को भी बड़ी मुश्किल से मिलती थी।  साथ ही साथ गेंहू और चावल की खेती में खर्च हो रहे अत्यधिक पानी के कारन गावों में तेज़ी से गिरते जल स्तर ने भी सरकार की चिंता को काफी बढ़ा दिया है।   

वो सब्जियां, अनाज और फल जिन्हें हम भारतीय समझते हैं, लेकिन वे भारत के मूल नहीं हैं 

अपनी आज की इस चर्चा को आगे बढ़ने से पहले हमे ये समझना होगा की आखिर कार जिन सब्जियों फलों और अनाजों को वास्तविकता में भारतीय समझते है वास्तव में उनकी हकीकत क्या है तो आईये सबसे पहले उन सब्जियों अनाजों और फलों के बारे में जानते है   

अब जरा उन चीजों को एक-एक करके देखते हैं जिन्हें हम आज पूरी तरह भारतीय मान बैठे हैं।

1. आलू — भारतीय थाली का सबसे बड़ा विदेशी मेहमान

आज आलू के बिना भारतीय भोजन की कल्पना करना ही मुश्किल है। आलू-गोभी, आलू-मटर, दम आलू, आलू पराठा, समोसा, कचौड़ी और न जाने कितने व्यंजन इसकी वजह से बने या लोकप्रिय हुए।

लेकिन आलू भारत का मूल निवासी नहीं है। इसकी उत्पत्ति दक्षिण अमेरिका के Andes क्षेत्र में हुई थी। यूरोपीय संपर्क के बाद यह दुनिया के दूसरे हिस्सों में पहुंचा और Portuguese व्यापारिक नेटवर्क के माध्यम से भारत आया।

यानी जिस आलू को आज हम उत्तर भारतीय घर की सबसे सामान्य सब्जियों में गिनते हैं, प्राचीन भारत के लोग उससे बिल्कुल परिचित नहीं थे। Indian Express ने भी K.T. Achaya के काम का हवाला देते हुए लिखा है कि Indus Valley Civilization और प्राचीन भारत के लोग आलू और टमाटर को जानते ही नहीं थे।

2. टमाटर — जिसके बिना आज की gravy अधूरी लगती है

टमाटर शायद इस पूरी सूची का सबसे दिलचस्प नाम है।

आज टमाटर भारतीय सब्जी, दाल, चटनी और gravy का इतना सामान्य हिस्सा है कि इसके बिना खाना बनाना मुश्किल लगता है। लेकिन टमाटर भी भारत का native plant नहीं है। इसकी origin अमेरिका से जुड़ी है और Portuguese के जरिए यह भारत पहुंचा।

और इसे भारतीय रसोई में अपनी जगह बनाने में काफी समय लगा।

19वीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों के एक Persian cooking manual में tomato soup का उल्लेख मिलता है, लेकिन Indian Express के अनुसार Portuguese द्वारा 16वीं शताब्दी में भारत लाए जाने के बावजूद लगभग तीन शताब्दी बाद तक टमाटर भारत में व्यापक रूप से लोकप्रिय नहीं हुआ था।

इससे एक बहुत दिलचस्प सवाल उठता है—अगर टमाटर नहीं था तो भारतीय gravy बनती कैसे थी?

इसका जवाब हमारे पुराने cooking system में मिलता है। इमली, दही, कच्चा आम, अमचूर, कोकम और अनारदाना जैसे ingredients पहले से ही खट्टापन देने के लिए इस्तेमाल होते थे।

3. मिर्च — भारतीय खाने का तीखापन भी हमेशा से भारतीय नहीं था

आज लाल मिर्च और हरी मिर्च भारतीय भोजन की पहचान जैसी लगती हैं। लेकिन chilli pepper भी Americas की फसल है।

Portuguese संपर्क के बाद मिर्च भारत पहुंची और धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गई। इससे पहले भारतीय भोजन में तीखापन पैदा करने के लिए काली मिर्च, पिप्पली और अदरक जैसे ingredients का इस्तेमाल होता था। बंगाल के food history पर लिखे एक शोधपरक लेख में भी Portuguese द्वारा chilli के आने और उससे पहले pepper तथा ginger के इस्तेमाल का उल्लेख मिलता है।

सोचिए, आज जिस लाल मिर्च के बिना हमारे मसाले का डिब्बा अधूरा लगता है, वह भी कभी भारतीय रसोई में मौजूद नहीं थी।

4. मक्का — जिसे आज हम देसी अनाज समझते हैं

मक्का यानी corn भी Americas से आया हुआ अनाज है।

आज पंजाब की मक्की की रोटी से लेकर भुट्टे और अलग-अलग regional dishes तक मक्का भारतीय भोजन का हिस्सा बन चुका है। लेकिन इसका मूल भारत नहीं है। Columbian Exchange के बाद मक्का दुनिया के दूसरे हिस्सों में पहुंचा और बाद में भारतीय खेती और भोजन में शामिल हुआ।

यानी मक्की की रोटी आज पूरी तरह भारतीय भोजन है, लेकिन मक्का स्वयं भारत का मूल अनाज नहीं है।

यह फर्क समझना बहुत जरूरी है। किसी ingredient का origin विदेशी हो सकता है लेकिन उससे बनी culinary tradition पूरी तरह भारतीय हो सकती है।

5. मूंगफली — भारतीय snack लेकिन विदेशी फसल

सर्दियों की मूंगफली, मूंगफली की चटनी, peanut chutney, चिवड़ा और कई दूसरी preparations को देखकर कौन कहेगा कि मूंगफली भारत की मूल फसल नहीं है?

मूंगफली की origin South America से जुड़ी है और यह भी Columbian Exchange के बाद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पहुंची। Indian cuisine के historical review में peanuts को भी उन New World crops में गिना गया है जो बाद में भारतीय भोजन का हिस्सा बनीं।

भारत में आने के बाद इसका इस्तेमाल केवल भुनी हुई मूंगफली तक सीमित नहीं रहा। अलग-अलग राज्यों की चटनियों, snacks और regional dishes में इसका इस्तेमाल होने लगा।

6. राजमा — राजमा-चावल भारतीय है, राजमा नहीं

राजमा-चावल का नाम सुनते ही उत्तर भारत की याद आती है। लेकिन kidney beans यानी राजमा की कहानी भी Americas से जुड़ी है।

Common bean की origin American continent से जुड़ी है और European contact के बाद यह Old World में पहुंची।

भारत में आने के बाद राजमा ने स्थानीय मसालों और cooking methods के साथ ऐसी पहचान बनाई कि आज राजमा-चावल को भारतीय भोजन से अलग करके देखना मुश्किल है।

यानी यहां भी वही कहानी है—ingredient बाहर का था लेकिन उसका भारतीय रूप भारत में बना।

7. काजू — भारतीय मिठाई का विदेशी ingredient

काजू कतली, काजू करी और त्योहारों की मिठाइयों में काजू का इस्तेमाल इतना आम है कि काजू हमें पूरी तरह भारतीय लगता है।

लेकिन काजू की origin Brazil से जुड़ी है। Portuguese समुद्री व्यापार के दौर में यह भारत पहुंचा और विशेष रूप से Goa तथा coastal regions में इसकी खेती और उपयोग बढ़ा। भारतीय cuisine पर scholarly review भी cashew को European Columbian exchange से भारत पहुंची crops में रखता है।

आज काजू भारतीय मिठाई और rich gravy का हिस्सा है, लेकिन इसका पौधा भारत का मूल निवासी नहीं है।

8. पपीता — जिसे हम सदियों पुराना भारतीय फल समझते हैं

पपीता भी भारतीय फल जैसा ही लगता है। घर के आंगन से लेकर बाजार तक इसकी मौजूदगी इतनी सामान्य है कि शायद ही कोई इसके origin के बारे में सोचता है।

लेकिन papaya की origin Americas में हुई थी। Portuguese trade के बाद यह भारत पहुंचा और धीरे-धीरे भारतीय agriculture और food culture का हिस्सा बन गया।

आज कच्चे पपीते की सब्जी से लेकर पका हुआ पपीता और papaya-based preparations तक इसके कई उपयोग हैं।

9. अनानास — भारतीय मौसम में उगता है लेकिन भारतीय मूल का नहीं

अनानास भी उन फलों में शामिल है जो भारत में इतनी अच्छी तरह उगते हैं कि हमें इसका विदेशी origin याद ही नहीं रहता।

इसकी origin tropical Americas से जुड़ी है और European maritime exchange के बाद यह एशिया सहित दुनिया के दूसरे हिस्सों में पहुंचा। Indian cuisine के इतिहास पर प्रकाशित review में pineapple को भी Portuguese Columbian exchange से भारत पहुंची फसलों में शामिल किया गया है।

आज पूर्वोत्तर भारत सहित कई क्षेत्रों में इसकी खेती होती है और यह भारतीय food culture में पूरी तरह शामिल हो चुका है।

10. अमरूद — भारतीय बाजार का बिल्कुल देसी दिखने वाला फल

सर्दियों में अमरूद पर नमक-मिर्च लगाकर खाना शायद भारत के सबसे सामान्य food experiences में से एक है।

लेकिन guava भी Americas से आया हुआ फल है। Portuguese trade के बाद यह भारत पहुंचा और बाद में भारतीय बागवानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

आज अमरूद की कई भारतीय किस्में और regional varieties मिलती हैं। इसलिए आज का भारतीय अमरूद हमारी कृषि और स्वाद का हिस्सा जरूर है, लेकिन इसका मूल भारत में नहीं है।

11. शकरकंद — भारतीय व्रत की थाली में पहुंचा विदेशी कंद

शकरकंद को भी अक्सर भारत की पुरानी indigenous crop मान लिया जाता है। लेकिन इसकी origin Americas में है और historical evidence इसे European maritime exchange के जरिए भारत पहुंचने वाली crops से जोड़ता है।

भारत में आने के बाद इसे उबालकर, भूनकर और अलग-अलग regional तरीकों से खाने की परंपरा बनी। बाद में यह व्रत और धार्मिक भोजन में भी अपनी जगह बनाने लगा।

12. चीकू — भारतीय बागों में मिला एक और विदेशी फल

चीकू या sapodilla भी भारत का मूल फल नहीं है। इसका origin tropical Americas में माना जाता है। भारतीय cuisine के historical review में sapodilla को भी उन crops में शामिल किया गया है जो European exchange के बाद भारत पहुंचे।

आज महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में इसकी खेती होती है और बाजार में यह इतना सामान्य है कि इसके विदेशी origin का अंदाजा लगाना मुश्किल है।

तो फिर भारत के अपने पुराने अनाज और फसलें कौन सी थीं?

अब यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि भारत के पास अपने पुराने अनाज और खाद्य फसलों की कमी थी।

Indus Valley Civilization के archaeological evidence में गेहूं, जौ, चना, मटर, अरहर, मूंग, मसूर जैसे legumes और cereals के इस्तेमाल के प्रमाण मिले हैं। रागी, कुछ millets, rice, sesame और mustard जैसी फसलों के भी प्रमाण मिलते हैं।

यानी जब हम यह कहते हैं कि आलू, टमाटर या मिर्च भारत के मूल नहीं हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि हमारे पूर्वजों की थाली में भोजन की कमी थी। बल्कि उस समय की भारतीय थाली में बाजरा, जौ, गेहूं, चावल, रागी, चना, मूंग, अरहर, तिल, सरसों और कई स्थानीय कंद-सब्जियां अपनी जगह रखती थीं।

भारतीय खाना आखिर बना कैसे?

यहीं से भारतीय food history की सबसे दिलचस्प बात सामने आती है।

भारत का खाना किसी एक समय में बनकर तैयार नहीं हुआ। इसमें अलग-अलग समय पर अलग-अलग जगहों से आई चीजें जुड़ती चली गईं।

आलू आया तो उससे आलू-गोभी और दम आलू बने।
मिर्च आई तो भारतीय मसाले का पूरा character बदल गया।
टमाटर आया तो gravy और chutney के कई नए रूप बने।
मक्का आया तो कई regional preparations बने।
मूंगफली आई तो चटनी और snacks में शामिल हो गई।
राजमा आया तो राजमा-चावल जैसी पहचान बनी।
काजू आया तो भारतीय मिठाइयों और rich gravies का हिस्सा बन गया।

इसलिए किसी ingredient का विदेशी होना उसे “कम भारतीय” नहीं बनाता। आज वह भारत की culinary history का हिस्सा है। फर्क सिर्फ इतना है कि अगर हम यह समझना चाहते हैं कि हमारे पूर्वज 500 या 1000 साल पहले क्या खाते थे, तो हमें आज की थाली को देखकर सीधे अतीत की कल्पना नहीं करनी चाहिए।

आज की भारतीय थाली वास्तव में कई सदियों की यात्राओं, व्यापार, खेती, migration और स्थानीय cooking traditions का परिणाम है। और शायद इसी वजह से भारतीय भोजन का इतिहास इतना दिलचस्प है—इसमें कुछ चीजें हजारों साल से यहां हैं, कुछ कुछ सदियों पहले आईं और कुछ इतनी नई हैं कि हमारे दादा-दादी के बचपन में भी उनका इस्तेमाल आज जितना आम नहीं था।

अंग्रेजों के आने से पहले भारतीय रसोई में इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक सब्जियाँ

अगर हम अंग्रेजों के भारत आने से पहले की भारतीय रसोई को समझना चाहते हैं तो केवल आज की सब्जियों की सूची देखकर यह तय करना ठीक नहीं होगा कि उस समय लोग क्या खाते थे। उस दौर की रसोई को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाकर यह देखना होगा कि अलग-अलग इलाकों में कौन-कौन से पौधे, कंद और फल आसानी से उपलब्ध थे और उन्हें खाने लायक बनाने के लिए लोग किन तरीकों का इस्तेमाल करते थे। यही बात इस पुराने भोजन को आज की रसोई से अलग करती है। उस समय टमाटर, आलू और लाल मिर्च जैसी चीजें भारतीय रसोई का हिस्सा नहीं थीं, लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं था कि लोगों के पास सब्जियों के विकल्प कम थे। सुरन, अरबी, कच्चा केला, केले का तना, कटहल और कई तरह के स्थानीय साग तथा कंद अलग-अलग क्षेत्रों की थाली में अपनी जगह बनाए हुए थे।

इनमें खास बात यह थी कि इनमें से कई चीजों को केवल काटकर कड़ाही में डाल देना पर्याप्त नहीं होता था। कुछ कंदों में ऐसे प्राकृतिक तत्व मौजूद थे जो उन्हें कच्चा या अधपका खाने पर मुंह और गले में जलन पैदा कर सकते थे, इसलिए उन्हें पहले भिगोने, उबालने या किसी खट्टी चीज के साथ पकाने जैसी प्रक्रियाएं अपनाई जाती थीं। यानी उस समय भोजन का ज्ञान केवल इस बात तक सीमित नहीं था कि कौन-सी चीज खाई जा सकती है, बल्कि यह भी मालूम था कि उसे किस तरह तैयार किया जाए ताकि वह स्वादिष्ट और खाने योग्य बने। सुरन इसकी एक अच्छी मिसाल है।

सुरन यानी जिमीकंद को खट्टे पानी में उबालने की परंपरा

सुरन यानी Elephant Foot Yam को देखकर आज शायद बहुत कम लोगों को अंदाजा हो कि इसे पकाने से पहले इतनी सावधानी की जरूरत क्यों पड़ती है। इसका वैज्ञानिक नाम Amorphophallus paeoniifolius है और ICAR-CCARI इसे भारत में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख कंदों में शामिल करता है। इसके कंद में स्टार्च की मात्रा अच्छी होती है, लेकिन इसमें oxalates भी पाए जाते हैं। यही कारण है कि कच्चा या ठीक से न पकाया गया सुरन कुछ लोगों के मुंह और गले में जलन तथा खुजली जैसी परेशानी पैदा कर सकता है।

शायद इसी वजह से पारंपरिक रसोई में सुरन को सीधे पकाने के बजाय पहले अच्छी तरह साफ करके काटा जाता था और फिर पानी में उबालने की प्रक्रिया अपनाई जाती थी। कई क्षेत्रों में इस पानी में इमली, अमचूर या किसी दूसरे खट्टे माध्यम का इस्तेमाल भी किया जाता था और उसके बाद सुरन को निकालकर मसालों के साथ पकाया जाता था। यहां खट्टे पदार्थ का इस्तेमाल केवल स्वाद बढ़ाने के लिए था या जलन पैदा करने वाले तत्वों को कम करने में उसकी कितनी भूमिका थी, यह हर पारंपरिक recipe के लिए एक जैसा नहीं माना जा सकता, लेकिन इतना जरूर है कि सुरन को तैयार करने की यह पूरी प्रक्रिया पीढ़ियों के अनुभव से विकसित हुई थी।

सुरन का महत्व केवल इस बात तक सीमित नहीं था कि उसे सावधानी से पकाना पड़ता था। पोषण की दृष्टि से भी यह मुख्य रूप से carbohydrate और starch देने वाला कंद है। ICAR के अनुसार इसके कंद में लगभग 18% starch, 1–5% protein और 2% तक fat पाया जा सकता है, हालांकि वास्तविक मात्रा किस्म और उत्पादन परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है। यही वजह है कि पुराने भोजन में सुरन जैसी चीजें केवल स्वाद के लिए नहीं थीं, बल्कि भोजन में ऊर्जा देने वाली चीजों के रूप में भी अपनी जगह रखती थीं।

और सुरन की तरह ही भारतीय रसोई में एक और कंद ऐसा था जिसका इस्तेमाल केवल उसकी जड़ तक सीमित नहीं था। वह था घुइयां या अरबी, जिसमें पौधे के दूसरे हिस्सों को भी भोजन में शामिल करने की परंपरा दिखाई देती है।

घुइयां या अरबी — जड़ से लेकर पत्तों तक का इस्तेमाल

घुइयां यानी अरबी भी भारतीय पारंपरिक भोजन में लंबे समय से इस्तेमाल होने वाला कंद है। इसे अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरीके से पकाया गया, लेकिन इसकी खासियत केवल इसके कंद तक सीमित नहीं रही। इसके पत्तों का भी भोजन में इस्तेमाल होता रहा है, जिससे यह समझ आता है कि पारंपरिक रसोई में किसी पौधे के खाने योग्य हिस्से को बेकार छोड़ने के बजाय उसका अधिकतम उपयोग करने की कोशिश की जाती थी।

अरबी को आमतौर पर पहले उबालकर नरम किया जाता है और फिर उसका छिलका हटाकर मसालों के साथ पकाया जाता है। कहीं इसे सरसों के तेल में भूनकर बनाया जाता है तो कहीं दही, बेसन या दूसरे स्थानीय ingredients के साथ इसकी अलग तैयारी होती है। इसके पत्तों को भी मसालों और बेसन के साथ लपेटकर पकाने की परंपरा कई क्षेत्रों में दिखाई देती है। इस तरह एक ही पौधे से अलग-अलग तरह के व्यंजन तैयार किए जा सकते थे।

पोषण की बात करें तो अरबी में मुख्य रूप से carbohydrate और starch मिलता है। इसके साथ dietary fibre तथा कुछ vitamins और minerals भी पाए जाते हैं। इस तरह अरबी भी उस भोजन व्यवस्था का हिस्सा थी जिसमें अनाज के अलावा कंद और जड़ वाली सब्जियां ऊर्जा और भोजन की विविधता दोनों उपलब्ध कराती थीं।

लेकिन भारतीय रसोई में यह सोच केवल जमीन के नीचे उगने वाले कंदों तक सीमित नहीं थी। पौधे के ऐसे हिस्से भी भोजन में इस्तेमाल किए जाते थे जिन्हें आज हम सब्जी के रूप में पहली नजर में नहीं देखते। कच्चा केला इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण है।

कच्चा केला — फल पकने का इंतजार किए बिना सब्जी

आज केले को देखते ही हमारे दिमाग में सबसे पहले फल का खयाल आता है, लेकिन भारतीय रसोई में केले का एक दूसरा रूप भी बहुत पहले से मौजूद रहा है। कच्चा केला पकने का इंतजार किए बिना ही सब्जी के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। इसका गूदा अपेक्षाकृत neutral स्वाद वाला होता है, इसलिए यह मसालों और gravy का स्वाद अच्छी तरह ग्रहण कर लेता है।

इसे बनाने की प्रक्रिया भी बहुत सीधी रही है। कच्चे केले को छीलकर टुकड़ों में काटा जाता है और फिर जरूरत के अनुसार हल्का उबाला या तेल में भुना जाता है। इसके बाद उसमें हल्दी, जीरा, धनिया, अदरक, लहसुन या उस क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले दूसरे मसाले डाले जाते हैं। कहीं इसे दही या किसी खट्टे ingredient के साथ पकाया जाता है तो कहीं इसकी सूखी सब्जी बनाई जाती है।

कच्चे केले की खासियत केवल इसके स्वाद में नहीं है। इसमें carbohydrate और resistant starch की अच्छी मात्रा मिल सकती है और इसके साथ dietary fibre, vitamin B6, vitamin C तथा potassium जैसे पोषक तत्व भी पाए जाते हैं। हालांकि पकाने के तरीके और केले की किस्म के अनुसार इसकी पोषण संरचना बदल सकती है।

और जब हम केले की बात कर रहे हैं तो भारतीय पारंपरिक रसोई की एक और खास बात सामने आती है। यहां केवल केला ही नहीं बल्कि केले के पौधे का दूसरा खाने योग्य हिस्सा भी इस्तेमाल किया जाता था। यही बात हमें केले के तने तक ले जाती है।

केले का तना — पौधे का वह हिस्सा जो भोजन बन गया

केले का तना इस बात का अच्छा उदाहरण है कि पारंपरिक भारतीय भोजन में उपलब्ध संसाधनों को किस तरह अधिकतम इस्तेमाल किया जाता था। केले का फल तो आसानी से पहचाना जाने वाला भोजन है, लेकिन उसके तने के अंदर मौजूद नरम हिस्से को भी निकालकर भोजन में शामिल किया जाता रहा है।

इसके लिए बाहरी परतें हटाकर अंदर का नरम हिस्सा निकाला जाता है। फिर उसे बारीक काटकर कुछ समय पानी में रखा जाता है और इसके बाद मसालों के साथ पकाया जाता है। दक्षिण भारत की कई पारंपरिक cuisines में banana stem को अलग-अलग तरीकों से तैयार किया गया है। कहीं इसे दाल के साथ मिलाया जाता है तो कहीं नारियल और मसालों के साथ इसकी अलग सब्जी बनाई जाती है।

केले के तने में पानी की मात्रा अधिक होती है और इसमें dietary fibre, potassium तथा कुछ दूसरे minerals भी पाए जाते हैं। लेकिन शायद इसकी सबसे दिलचस्प बात इसका पोषण नहीं बल्कि इसका इस्तेमाल है। एक ही पौधे के फल, तने और दूसरे हिस्सों को भोजन में शामिल करने की यह आदत हमें उस पारंपरिक food system की याद दिलाती है जिसमें भोजन केवल स्वाद का विषय नहीं था, बल्कि उपलब्ध संसाधनों का समझदारी से उपयोग करना भी उसका हिस्सा था।

इसी सोच का एक और बड़ा उदाहरण कटहल है, क्योंकि कटहल में भी एक ही फल को अलग-अलग अवस्थाओं में अलग तरह से भोजन बनाया जा सकता है।

कटहल — सब्जी भी और भरपूर भोजन भी

कटहल को आज कई लोग vegetarian meat के विकल्प के रूप में देखते हैं, लेकिन इसे केवल आधुनिक meat substitute मानना इसके पुराने भारतीय उपयोग को छोटा कर देगा। कच्चे कटहल को भारतीय उपमहाद्वीप में लंबे समय से सब्जी के रूप में पकाया जाता रहा है और इसकी बनावट ऐसी है कि मसालों और gravy के साथ पकने के बाद यह काफी भरपूर भोजन जैसा अनुभव देता है।

हालांकि इसे तैयार करना बाकी कई सब्जियों की तुलना में थोड़ा मेहनत वाला काम है। कटहल काटते समय चिपचिपा latex निकलता है, इसलिए पारंपरिक रसोई में हाथ और चाकू पर तेल लगाने जैसी तरकीबें अपनाई जाती थीं। इसके बाद कटहल के टुकड़ों को मसालों के साथ पकाया जाता था। कहीं इसकी सूखी सब्जी बनाई जाती है तो कहीं गाढ़ी और मसालेदार gravy तैयार की जाती है।

कच्चे कटहल में carbohydrate और dietary fibre के साथ कुछ मात्रा में protein भी पाया जाता है। इसके अलावा इसमें vitamin C और potassium जैसे micronutrients भी मिलते हैं। पकने के बाद इसका गूदा नरम और रेशेदार हो जाता है, जिसके कारण यह मसालों और gravy को अच्छी तरह पकड़ लेता है।

अब तक जिन सब्जियों की बात हुई, उनमें से कई भारतीय उपमहाद्वीप की पुरानी खाद्य परंपराओं से जुड़ी हुई हैं। लेकिन यहां एक ऐसी चीज का जिक्र करना भी जरूरी है जिसे अक्सर लोग गलती से प्राचीन भारतीय भोजन का हिस्सा मान लेते हैं। वह है शकरकंद।

शकरकंद को लेकर एक जरूरी ऐतिहासिक बात

अगर हम भारत की पुरानी रसोई की बात कर रहे हैं तो शकरकंद को लेकर थोड़ी सावधानी जरूरी है। इसे भारत की हजारों साल पुरानी स्वदेशी सब्जी कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा। शकरकंद की उत्पत्ति अमेरिका में मानी जाती है और ऐतिहासिक शोध के अनुसार Portuguese समुद्री संपर्क के माध्यम से यह भारत और दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुंचा।

इसका मतलब यह नहीं है कि शकरकंद भारतीय भोजन का हिस्सा नहीं बना। भारत पहुंचने के बाद यह धीरे-धीरे यहां की खाद्य परंपराओं में शामिल हुआ और आज इसे उबालकर, भूनकर तथा चाट जैसी कई preparations में इस्तेमाल किया जाता है। इसमें complex carbohydrates, dietary fibre, potassium और beta-carotene जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं और नारंगी रंग वाली कुछ किस्मों में beta-carotene की मात्रा विशेष रूप से अधिक हो सकती है।

शकरकंद का उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे हमें यह समझने में मदद मिलती है कि भारतीय भोजन कोई एक जगह पर रुकी हुई परंपरा नहीं थी। बाहर से आने वाली चीजें भी समय के साथ यहां की रसोई में शामिल होती गईं। यही बात टमाटर के मामले में भी दिखाई देती है और यहां से भारतीय ग्रेवी की कहानी और दिलचस्प हो जाती है।

लेकिन टमाटर के बिना भारतीय ग्रेवी बनती कैसे थी?

आज टमाटर भारतीय खाना पकाने में इतना सामान्य हो चुका है कि उसके बिना किसी सब्जी की gravy की कल्पना करना कई लोगों को मुश्किल लग सकता है। लेकिन अगर हम टमाटर के भारतीय रसोई में लोकप्रिय होने से पहले के समय में जाएं तो सवाल बिल्कुल उल्टा हो जाता है—जब टमाटर था ही नहीं, तब लोग gravy में खट्टापन और गाढ़ापन लाते कैसे थे?

इसका जवाब भारतीय रसोई की विविधता में छिपा हुआ है। टमाटर से पहले खट्टापन देने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में इमली, कच्चा आम, अमचूर, कोकम, अनारदाना और दही जैसी चीजों का इस्तेमाल किया जाता था। वहीं gravy को गाढ़ा और भरपूर बनाने के लिए नारियल, खसखस, तिल, काजू और दूसरे nuts तथा seeds की paste इस्तेमाल की जाती थी। यानी एक ही ingredient पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग इलाकों ने अपने आसपास उपलब्ध चीजों से अपनी cooking techniques विकसित की थीं।

इसे अगर एक सामान्य cooking process की तरह समझें तो पहले तेल या घी को गर्म करके उसमें जीरा, सरसों, तेजपत्ता, दालचीनी, लौंग या उस क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले दूसरे साबुत मसाले डाले जाते थे। इसके बाद प्याज या मसालों की paste को भुना जाता था और उसमें अदरक, लहसुन तथा powdered spices मिलाए जाते थे। मसालों के अच्छी तरह पकने के बाद gravy को body देने के लिए नारियल, खसखस, तिल, दही या nuts की paste इस्तेमाल की जा सकती थी।

इसके बाद उस preparation के स्वाद को संतुलित करने के लिए खट्टापन जोड़ा जाता था। दक्षिण भारत की किसी तैयारी में यह काम इमली कर सकती थी, पश्चिमी भारत में कोकम का इस्तेमाल हो सकता था, उत्तर भारत में अमचूर या अनारदाना अपनी भूमिका निभा सकता था और कुछ व्यंजनों में दही या कच्चा आम वही स्वाद दे सकता था जिसकी आज हमें टमाटर से आदत हो चुकी है। आखिर में सब्जी डालकर उसे धीमी आंच पर पकाया जाता था ताकि मसालों, खट्टे पदार्थ और सब्जी का स्वाद आपस में अच्छी तरह मिल जाए।

यानी टमाटर के आने से पहले भारतीय रसोई में gravy बनाने की तकनीक की कोई कमी नहीं थी। फर्क सिर्फ इतना था कि आज जिस काम के लिए हम अक्सर टमाटर का इस्तेमाल करते हैं, उस समय वही काम अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग ingredients और cooking methods से किया जाता था।

भारतीय भोजन के इतिहास पर लिखने वाले खाद्य इतिहासकार K.T. Achaya ने भी इस व्यापक बदलाव की ओर ध्यान दिलाया है कि टमाटर, आलू और मिर्च जैसी New World फसलें यूरोपीय समुद्री संपर्क के बाद भारत पहुंचीं और भारतीय cuisines में इन्हें जगह बनाने में समय लगा। टमाटर के भारत पहुंचने और बाद में लोकप्रिय होने की प्रक्रिया को लेकर Portuguese संपर्क का उल्लेख भी खाद्य इतिहास से जुड़े लेखन में मिलता है।

इस पूरी कहानी को देखने पर एक बात काफी साफ दिखाई देती है। टमाटर के बिना भारतीय खाना अधूरा नहीं था। टमाटर ने बाद में भारतीय रसोई को एक नया ingredient जरूर दिया, लेकिन उससे पहले भी यहां खट्टापन पैदा करने, gravy को गाढ़ा करने, स्वाद संतुलित करने और सब्जियों को स्वादिष्ट बनाने की अपनी पूरी परंपरा मौजूद थी।

और शायद यही बात अंग्रेजों के आने से पहले की भारतीय रसोई को समझने की सबसे अच्छी कुंजी है। उस समय की रसोई को केवल इस सवाल से नहीं समझा जा सकता कि लोग कौन-सी सब्जियां खाते थे। असली कहानी यह है कि उनके आसपास जो उपलब्ध था, उन्होंने उसे किस तरह भोजन में बदला। 

प्राचीन भारत से चला आ रहा Food Storage System

आज हमारे घर में खाना बच जाए तो उसे refrigerator में रख देना सबसे सामान्य बात है। किसी फल या सब्जी को लंबे समय तक बचाकर रखना हो तो freezer भी मौजूद है और बाजार में ऐसी packaging भी आसानी से मिल जाती है जो खाने की चीजों को काफी समय तक सुरक्षित रखने में मदद करती है। लेकिन अगर हम उस समय के भारत की कल्पना करें जब न refrigerator था, न freezer और न ही आज जैसी आधुनिक packaging, तो एक सवाल अपने आप सामने आता है—जब किसी मौसम में खेतों से बहुत ज्यादा अनाज निकलता था या आम, नींबू, सब्जियां और दूसरी खाने की चीजें एक साथ बड़ी मात्रा में उपलब्ध होती थीं, तब लोग उन्हें अगले कई महीनों तक कैसे बचाकर रखते थे?

इस सवाल का जवाब भारतीय food culture की उस पुरानी परंपरा में मिलता है जिसमें भोजन को केवल पकाने का ज्ञान ही नहीं था बल्कि उसे लंबे समय तक सुरक्षित रखने के तरीके भी विकसित किए गए थे। मौसम में जो चीज भरपूर मिलती थी उसे उसी समय पूरा खा लेना जरूरी नहीं था। उसे सुखाया जा सकता था, नमक लगाया जा सकता था, तेल और मसालों के साथ रखा जा सकता था, fermentation के जरिए बदला जा सकता था या दूध जैसी जल्दी खराब होने वाली चीज को किसी दूसरे रूप में बदलकर उसकी shelf life बढ़ाई जा सकती थी। इस तरह मौसम कुछ समय के लिए बदलता जरूर था लेकिन उसका भोजन पूरे साल की रसोई में बना रह सकता था।

भारतीय भोजन के इतिहास पर काम करने वाले food historian K.T. Achaya ने भी भारतीय food traditions को समझने के लिए archaeological evidence, पुराने साहित्य, botanical evidence और अलग-अलग क्षेत्रों की food practices का सहारा लिया है। उनके काम से यह समझने में मदद मिलती है कि भारतीय food culture केवल recipes और cooking methods का इतिहास नहीं है। इसके पीछे भोजन को उपलब्ध मौसम से आगे तक पहुंचाने और उसे खराब होने से बचाने का एक पूरा ज्ञान भी रहा है। इस knowledge को समझने के लिए शायद सबसे अच्छा उदाहरण अचार है।

अचार — भारत का पारंपरिक food preservation system

अगर भारतीय food preservation की कहानी शुरू की जाए तो अचार का जिक्र किए बिना वह कहानी अधूरी ही रहेगी। आज आम का अचार, नींबू का अचार या मिर्च का अचार हमारे खाने के साथ परोसी जाने वाली एक छोटी-सी चीज लग सकता है, लेकिन इसकी उपयोगिता केवल स्वाद बढ़ाने तक सीमित नहीं थी। जब किसी मौसम में कोई फल या सब्जी बहुत अधिक मात्रा में उपलब्ध होती थी, तो उसे किसी ऐसे रूप में बदल देना जरूरी था जिसे बाद के महीनों में भी खाया जा सके। अचार इसी जरूरत का एक जवाब था।

अचार की खासियत यह थी कि इसमें केवल एक preservation technique काम नहीं करती थी। नमक, खट्टापन, तेल, मसाले और कई मामलों में धूप—इन सभी का इस्तेमाल एक साथ या अलग-अलग तरीकों से किया जाता था। यही combination खाने की चीज को लंबे समय तक टिकाए रखने में मदद करता था। यानी जिस आम को कुछ समय बाद खराब हो जाना था, उसे नमक, मसाले, तेल और खट्टेपन के साथ तैयार करके मौसम के खत्म होने के बाद भी खाने योग्य रखा जा सकता था।

अचार की यह परंपरा कितनी पुरानी है, इसका अंदाजा पुराने साहित्य से लगाया जा सकता है। K.T. Achaya ने अपनी किताब Indian Food: A Historical Companion में लगभग 1170 CE की Lilavati में fruits, vegetables और roots से बने अनेक pickles के उल्लेख की ओर ध्यान दिलाया है। इसके बाद 14वीं शताब्दी के Kannada text Nalachampu में green mango, ginger, green pepper, cardamom और दूसरे ingredients के pickles का वर्णन मिलता है। 16वीं शताब्दी के Gujarati text Varanaka-Samuchaya में भी athanu, goondas और chundo जैसे preparations के उल्लेख मिलते हैं।

इन उदाहरणों से कम से कम इतना स्पष्ट होता है कि अचार भारतीय भोजन में कोई हाल की चीज नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग ingredients और methods के साथ इसे विकसित किया गया और इसके पीछे एक व्यावहारिक जरूरत भी थी—मौसम में उपलब्ध भोजन को उस मौसम के खत्म होने के बाद भी इस्तेमाल किया जा सके। लेकिन भोजन को बचाकर रखने का भारतीय तरीका केवल अचार तक सीमित नहीं था। कुछ foods को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए उन्हें किसी दूसरे रूप में बदलने की प्रक्रिया भी अपनाई जाती थी और यहां से fermentation की परंपरा सामने आती है।

केवल अचार नहीं, fermentation भी था preservation का तरीका

Fermentation को आज हम अक्सर दही या कुछ खास traditional foods के स्वाद और texture से जोड़कर देखते हैं, लेकिन पुराने food systems में इसकी भूमिका इससे कहीं बड़ी थी। Fermentation के दौरान microorganisms food के chemical composition में बदलाव लाते हैं और कई foods में acidity बढ़ने जैसी प्रक्रियाएं होती हैं। इन बदलावों के कारण कुछ खाद्य पदार्थ अपेक्षाकृत लंबे समय तक सुरक्षित रह सकते हैं।

भारतीय भोजन में दही इसका सबसे परिचित उदाहरण है। दूध को सीधे रखने पर वह जल्दी खराब हो सकता है, लेकिन fermentation के जरिए वही दूध दही में बदल जाता है। इसी तरह कुछ regional fermented batters और दूसरे fermented foods भी अलग-अलग क्षेत्रों में विकसित हुए। यानी fermentation में केवल भोजन का स्वाद और texture नहीं बदलता था, बल्कि उसकी प्रकृति भी बदल जाती थी।

यहीं से भारतीय preservation system की एक महत्वपूर्ण सोच सामने आती है—हर चीज को उसी रूप में लंबे समय तक बचाकर रखना जरूरी नहीं था। कई बार उसे ऐसे नए food product में बदल दिया जाता था जो ज्यादा समय तक इस्तेमाल किया जा सके। यही तरीका दूध के मामले में भी दिखाई देता है।

दूध को लंबे समय तक कैसे बचाते थे?

दूध उन खाद्य पदार्थों में से है जो सामान्य परिस्थितियों में जल्दी खराब हो सकते हैं। इसलिए पुराने समय में दूध को केवल दूध के रूप में सुरक्षित रखने की कोशिश करने के बजाय उससे अलग-अलग food products बनाने की परंपरा विकसित हुई। दूध से दही बनाया गया, दही से छाछ और मक्खन जैसे products तैयार हुए और मक्खन को आगे process करके घी बनाया गया।

इनमें घी का महत्व खास था क्योंकि मक्खन से पानी और milk solids का बड़ा हिस्सा अलग हो जाने के बाद ऐसा product मिलता है जिसे अपेक्षाकृत लंबे समय तक रखा जा सकता है। यानी दूध को बचाने का तरीका यह नहीं था कि उसे उसी रूप में महीनों तक रखा जाए। इसके बजाय उसकी प्रकृति बदल दी गई और उसे ऐसे रूप में बदल दिया गया जो लंबे समय तक उपयोग में आ सके।

इस उदाहरण से preservation की एक बहुत पुरानी और व्यावहारिक सोच समझ आती है—अगर कोई food जल्दी खराब होता है तो उसे किसी दूसरे food product में बदल दो। लेकिन दूध अकेली ऐसी चीज नहीं थी जिसे इस तरह बदला जाता था। जिन क्षेत्रों में मांस और मछली भोजन का हिस्सा रहे हैं, वहां उन्हें बचाकर रखने के लिए भी इसी तरह मौसम और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग तरीके विकसित हुए।

मांस और मछली जैसी जल्दी खराब होने वाली चीजों को कैसे बचाते थे?

मांस और मछली जैसी चीजें भी सामान्य परिस्थितियों में लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रहतीं। इसलिए भारत के अलग-अलग हिस्सों में इन्हें preserve करने के लिए नमक लगाने, सुखाने और smoking जैसी techniques का इस्तेमाल किया गया। इन तरीकों का चुनाव केवल स्वाद के आधार पर नहीं होता था। जिस इलाके में कौन-सा food उपलब्ध था और वहां का मौसम कैसा था, preservation की technique भी काफी हद तक उसी के अनुसार विकसित हुई।

कर्नाटक के ऐतिहासिक food practices से जुड़े स्रोतों में meat को नमक लगाकर और सुखाकर सुरक्षित करने के उदाहरण मिलते हैं। दूसरी ओर coastal और northeastern regions में fish और दूसरे seafood को धूप और हवा में सुखाकर preserve करने की परंपराएं भी देखने को मिलती हैं। सुखाने का मूल विचार सरल था—खाने की चीज से नमी कम कर दी जाए ताकि उसके खराब होने की प्रक्रिया धीमी हो सके।

इस तरह देखा जाए तो नमक, धूप, हवा, तेल, खट्टापन और fermentation अलग-अलग दिखाई देने वाली techniques जरूर हैं, लेकिन इनके पीछे एक ही जरूरत काम कर रही थी—आज उपलब्ध भोजन को कल भी खाने लायक बनाए रखना।

और यही बात प्राचीन भारतीय food storage system को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। उस समय storage का मतलब केवल किसी चीज को एक बर्तन में भरकर रख देना नहीं था। कई बार storage का अर्थ ही food को एक नए रूप में बदल देना था। आम को अचार बनाया जा सकता था, दूध को दही और फिर घी में बदला जा सकता था, कुछ foods को सुखाया जा सकता था और कुछ को fermentation के जरिए नया रूप दिया जा सकता था।

इसलिए पुराने भारतीय food preservation को केवल refrigerator के बिना जीने की मजबूरी के रूप में देखना सही नहीं होगा। यह मौसम, स्थानीय संसाधनों और भोजन की प्रकृति को समझकर विकसित हुई एक व्यावहारिक व्यवस्था थी। जिस मौसम में जो चीज ज्यादा मिलती थी, उसे बचाने का कोई न कोई तरीका खोज लिया जाता था ताकि भोजन की उपलब्धता केवल एक मौसम तक सीमित न रहे।

यही कारण है कि भारतीय रसोई में अचार, घी, सूखे खाद्य पदार्थ, fermented foods और दूसरे preserved products केवल स्वाद की चीजें नहीं थे। वे उस समय की food economy और घरेलू जीवन का हिस्सा भी थे। आज refrigerator और freezer ने हमारे लिए storage को बहुत आसान बना दिया है, लेकिन पुराने समय में विकसित हुई ये परंपराएं हमें यह दिखाती हैं कि आधुनिक मशीनों के आने से बहुत पहले भी भारतीय समाज के पास भोजन को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के अपने तरीके मौजूद थे।

और शायद इस पूरी परंपरा की सबसे दिलचस्प बात यही है कि इसमें food storage और cooking एक-दूसरे से अलग नहीं थे। भोजन को कैसे पकाना है, उसे कैसे बदलना है और उसे कितने समय तक बचाकर रखना है—ये तीनों बातें एक ही food system का हिस्सा थीं। यही वजह है कि प्राचीन भारतीय रसोई को समझने के लिए केवल उसकी recipes देखना काफी नहीं है; उसकी preservation techniques को समझना भी उतना ही जरूरी है।

 निष्कर्ष

भारत का असली पारंपरिक भोजन किसी एक अनाज, सब्जी या मांसाहार-शाकाहार की पहचान तक सीमित नहीं था। अलग-अलग समय और क्षेत्रों में लोगों की थाली स्थानीय मौसम, मिट्टी, खेती और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार बदलती रही। बाजरा, रागी, जौ, कंद, स्थानीय साग, फल, सब्जियां और अलग-अलग तरह के preserved foods इस भोजन व्यवस्था का हिस्सा रहे। अचार, सुखाने, fermentation और घी जैसी तकनीकों ने मौसमी भोजन को लंबे समय तक बचाने में मदद की। इसलिए आज की भारतीय थाली को ही हजारों साल पुरानी थाली मान लेना सही नहीं होगा। असली भारतीय food culture उसकी विविधता, स्थानीयता और पीढ़ियों से विकसित उस समझ में छिपा है जिसने उपलब्ध भोजन को स्वादिष्ट, टिकाऊ और उपयोगी बनाया।